सूक्तयः

सूक्तयः

सूक्तयः पाठ – परिचय

“सूक्तयः” पाठ तिरुवल्लुवर महाकवि के “तिरुक्कुरल” नामक ग्रन्थ से लिया गया है और संस्कृत में देवनागरी लिपि में अनूदित हुआ है। मूलरूप से यह ग्रन्थ तमिलभाषा में है और इसके लेखक भी तमिलभाषी महाकवि हैं। तिरुक्कुरल तमिलभाषा में रचित “तमिल साहित्य” की उत्कृष्ट कृति है। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ माना जाता है। इसके प्रणेता तिरुवल्लुवर हैं। ग्रन्थ का रचनाकाल प्रथम ईस्वी शताब्दी है। इस ग्रन्थ में समस्त मानव जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन हुआ है। तिरु’ शब्द ‘श्री’ का वाचक है।’तिरुक्कुरल’ पद का अभिप्राय है ‘श्रिया युक्तं कुरत् छन्दः’ अथवा ‘श्री युक्तवाणी’। इस ग्रन्थ में धर्म-अर्थ-काम नामक तीन भाग हैं। तीनों भागों में पद्य संख्या 1330 है। प्रस्तुत श्लोक सरस, सरल भाषायुक्त तथा प्रेरणाप्रद है।

Sanskrit सूक्तयः Important Questions and Answers

सूक्तयः पाठबोधः

1. पिता यच्छति पत्राय बाल्ये विद्याधनं महत।
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥1॥
अन्वयः-पिता पुत्राय बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति। पिता अस्य किं तपः तेपे, इति उक्तिः तत् कृतज्ञता।

हिन्दी अनुवाद

शब्दार्थ-बाल्ये = बचपन में। यच्छति = देता है। तेपे = (तपस्या कृता) तप किया। उक्तिः = कथन। तम् = उस पिता के प्रति। कृतज्ञता = उपकार मानने का भाव। पिता अपने पुत्र को बचपन में महान् विद्यारूपी धन को देता है। पिता ने इस पुत्र के लिए कितना तप किया ? यह कथन ही उस पिता के प्रति कृतज्ञता है।

भावार्थ-भाव यह है कि बाल्यकाल में पिता अपनी सन्तान के लिए जो कष्ट सहता है, योग्य पुत्र उसके इस तप को अनुभव करता है और पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है।

2. अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः॥2॥
अन्वयः-यदि तथा चित्ते अवक्रता तथा वाचि भवेत् महात्मानः तत् एव समत्वम् इति तथ्यत: आहुः।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-अवक्रता = (न-वक्रता/ऋजुता) सरलता। यथा = जैसी।वाचि = (वाण्याम्) वाणी में। तदेव = उसे ही। समत्वम् = समानता। तथ्यतः = (यथार्थरूपेण) सच्चे रूप में, वास्तव में। यदि जैसी सरलता मन में हो, वैसी ही वाणी में भी हो तो महात्मा लोग, उसे सच्चे रूप में समानता (मन और वचन की समानता) कहते हैं। .

भावार्थ-महापुरुषों का मन जैसा निष्कपट होता है, वैसे ही उनकी वाणी भी निष्कपट होती है।

3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
परित्यज्य फलं पक्वं भुड्कतेऽपक्वं विमूढधीः ॥3॥
अन्वयः-यः विमूढधी: धर्मप्रदां वाचं त्यक्त्वा परुषां वाचं अभ्युदीरयेत्। (सः) पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं भुंक्त।

हिन्दी अनुवाद

शब्दार्थ-धर्मप्रदाम् = धर्म को प्रदान करने वाली।वाचम् = वाणी में। परुषाम् = (कठोराम्) कठोर।अभ्युदीरयेत् = (वदेत्) बोले, बोलता है। परित्यज्य = छोड़कर। पक्वम् = पका हुआ। भुक्ते = खाता है। अपक्वम् = कच्चा। विमूढधीः = (मूर्खः/बुद्धिहीनः) मूर्ख बुद्धिवाला। वाचम् = वाणी को।

जो मूढ़ बुद्धि वाला (अज्ञानी), धर्म को प्रदान करने वाली वाणी को छोड़कर, कठोर वाणी बोलता है, वह पके हुए फल को छोड़कर कच्चे फल को खाता है। भावार्थ-भाव यह है कि कठोरवाणी को त्यागकर, मधुरवाणी को अपनाना चाहिए।

4. विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्यन्तः प्रकीर्तिताः।
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुनामिनी मते॥4॥
अन्वयः-अस्मिन् लोके विद्वांस एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः । ये अन्येषां वदने ते तु चक्षुनामिनी मते।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-लोके = संसार में। चक्षुष्मन्तः = (नेत्रवन्तः) आँखों वाले। प्रकीर्तिताः = कहे गए हैं। ये = जो।तु = तो। अन्येषाम् = दूसरों के।वदने = (आनने/मुखे) मुख में। ते = वे। चक्षुनामिनी = नाममात्र की आँखें। मते = मानी गई हैं। इस संसार में विद्वान् लोग ही आँखों वाले कहे गए हैं। दूसरों के मुख पर जो आंखें हैं, वे तो नाममात्र की आँखें मानी गई हैं।

भावार्थ-भाव यह है कि ज्ञानचक्षु ही मनुष्य की असली आँख हैं, जिनसे जीवन का दर्शन होता है। भौतिक आँख अतीत और भविष्य को नहीं दिखा सकती।

5. यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
कर्तुं शक्यो भवेद्येन सः विवेक इतीरितः॥5॥
अन्वयः-येन केन अपि यत् प्रोक्तं, तस्य तत्त्व-अर्थनिर्णयः येन कर्तुं शक्यः भवेत् सः विवेकः इति ईरितः।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-येन केन अपि = जिस किसी के भी द्वारा। यत् प्रोक्तम् = जो कुछ कहा गया है। तत्त्वार्थः = वास्तविक अर्थ। इति इस प्रकार, यह। ईरितः = (कथितः/प्रेरितः) कहा गया है।

जिस किसी के भी द्वारा जो कुछ कहा गया है, उसके वास्तविक अर्थ का निर्णय जिसके द्वारा किया जा सकता है, उसे ‘विवेक’ कहा गया है।
भावार्थ-भाव यह है कि अच्छे-बुरे की निर्णायक विवेक बुद्धि होती है।

6. वाक्पटुः धैर्यवान् मन्त्री सभायामप्यकातरः।
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते॥6॥
अन्वयः-(यः) वाक्पटुः धैर्यवान् सभायाम् अपि अकातरः मन्त्री सः परैः केन अपि प्रकारेण न परिभूयते।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-वाक्पटुः = (वाचि/सम्भाषणे पटुः) वाणी में कुशल। अकातरः = (वीर:/साहसी) निडर। मन्त्री = मन्त्र (परामर्श) देने वाला। परैः = शत्रुओं द्वारा। परिभूयते = (तिरस्क्रियते/अवमान्यते) पराजित होता है।

जो बोलने में कुशल (वक्ता), धैर्यशाली , सभा में भी निर्भीक रहकर, अपना परामर्श देने वाला होता है, वह शत्रुओं के द्वारा किसी भी प्रकार पराजित नहीं होता है।

7. य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च।
न कुर्यादहितं कर्म सः परेभ्यः कदापि च॥7॥
अन्वयः-य: आत्मनः श्रेयः, प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, स: च कदापि परेभ्यः अहितं कर्म न कुर्यात्।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-आत्मनः = अपने लिए। श्रेयः = (कल्याणम्) कल्याण। प्रभूतानि = (अत्यधिकानि) अत्यधिक। परेभ्यः = दूसरों के लिए। अहितम् = बुरा अकल्याणकारक। कुर्यात् = करे।
जो अपने लिए कल्याण तथा अत्यधिक सुखों को चाहता है, वह कभी भी दूसरों के लिए बुरा काम नहीं करे। भावार्थ-भाव यह है कि अपनी आत्मा के प्रतिकूल दूसरों के लिए व्यवहार न करें। दूसरों के हित में ही अपना हित होता है।

8. आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः।
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥8॥
अन्वयः-आचारः प्रथमः धर्मः, इति एतत् विदुषां वचः । तस्मात् प्राणेभ्यः अपि विशेषतः सदाचारम् रक्षेत्।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-आचारः = सदाचार। प्रथमः = पहला, सर्वप्रथम। विदुषाम् = (विद्वद्जनानाम्) विद्वानों का। वचः = वचन। प्राणेभ्यः अपि = प्राणों से भी, प्राण देकर भी। विशेषतः = विशेषरूप से।
सदाचार सर्वप्रथम धर्म है, ऐसा विद्वानों का वचन है। इसलिए प्राणों से भी विशेषकर सदाचार की रक्षा करनी चाहिए। भावार्थ-अच्छा आचरण धर्म की पहली सीढ़ी है, अतः जीवन में सफलता पाने के लिए प्राणों का बलिदान करके भी, सत् आचरण का पालन करना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न
पाठ का सार-चेन्नई के समुद्र तट पर तिरुवल्लुवर महाकवि की प्रतिमा को देखकर छात्रों को, उनके विषय में तथा उनके ग्रन्थ के विषय में जानने की इच्छा जागृत होती है। उस ग्रन्थ के कुछ पद्यों का सार इस प्रकार वर्णित हुआ हैपिता अपनी सन्तान के लिए जो तप करता है, पुत्र को उसके प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। मन, वचन और कर्म में समानता होनी चाहिए, महात्माओं में ऐसा ही गुण होता है। मनुष्य को मधुरवाणी बोलकर उसके मीठे फल को खाना चाहिए, कठोरवाणी मूर्ख व्यक्ति बोलते हैं।
विद्वान् विवेकशील होते हैं, जिसके कारण उन्हें आँखों वाला कहा जाता है। अन्य लोगों की आँखों तो चर्म-चक्षु हैं, जिनसे यथार्थवस्तु को देखा नहीं जा सकता। विवेक का अर्थ है-अच्छे-बुरे के निर्णय करने की क्षमता। परामर्शदायक व्यक्ति वाक्पटु, निर्भीक तथा धैर्यवान् बनकर शत्रुओं से भी अपराजेय रहता है। यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, तो उसे दूसरों की हानि नहीं करनी चाहिए। सदाचार का पालन सबसे बड़ा धर्म है। इस सदाचार की रक्षा प्राण देकर भी करनी चाहिए।

Sanskrit सूक्तयः शोभा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
प्रश्नानाम् उत्तरम् एकपदेन दीयताम्
( मौखिक-अभ्यासार्थम्)
(क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति ?
(ख) मूढमतिः कीदृशीं वाचं परित्यजति ?
(ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः ?
(घ) प्राणेभ्योपि को रक्षणीयः ?
(ङ) आत्मनः श्रेयः इच्छन् नरः कीदृशं कर्म न कुर्यात् ?
(च) वाचि किं भवेत् ?
उत्तराणि
(क) विद्याधनम्,
(ख) धर्मप्रदाम्,
(ग) विद्वांसः,
(घ) सदाचारः,
(ङ) अहितम्।

प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
यथा- विमूढधीः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते ।
कः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते।
(क) संसारे विद्वांसः ज्ञानचक्षुभिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते।
(ख) जनकेन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते ।
(ग) तत्त्वार्थस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः ।
(घ) धैर्यवान् लोके परिभवं न प्राप्नोति।
(ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात् ।
उत्तराणि:
(क) संसारे के ज्ञानचक्षुभिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते?
(ख) जनकेन कस्मै शैशवे विद्याधनं दीयते?
(ग) कस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः?
(घ) धैर्यवान् कुत्र परिभवं न प्राप्नोति?
(ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः केषाम् अनिष्टं न कुर्यात् ?

प्रश्न 3.
पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचितपदक्रमेण पूरयत
(क) पिता…………..बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति, अस्य पिता किं तपः तेपे इत्युक्तिः ……………।
(ख) येन…………. यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः येन कर्तुं…………भवेत्, सः…………इति ………….
(ग) य आत्मनः श्रेयः…………..सुखानि च इच्छति, परेभ्यः अहितं…………..कदापि च न ………………
उत्तराणि:
(क) पिता पुत्राय बाल्ये महत् विद्याधनम् यच्छति, अस्य पिता किं तपः तेपे, इत्युक्तिः तत् कृतज्ञता।
(ख) येन केनापि यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः येन कर्तुं शक्यः भवेत्, सः विवेकः इति ईरितः।
(ग) य आत्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, सः परेभ्यः अहितं कर्म कदापि च न कुर्यात्।

प्रश्न 4.
अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
प्रश्नाः
(क) श्लोक संख्या-3 यथा-सत्या मधुरा च वाणी का ? धर्मप्रदा
(क) धर्मप्रदां वाचं कः त्यजति ? विमूढधीः
(ख) मूढपुरुष: कां वाणीं वदति ? परुषाम्
(ग) मन्दमतिः कीदृशं फलं खादति ? अपक्वम्
उत्तराणि
(क) धर्मप्रदां वाचं कः त्यजति ? विमूढधीः
(ख) मूढपुरुषः कां वाणीं वदति ? परुषाम्
(ग) मन्दमतिः कीदृशं फलं खादति ? अपक्वम्

(ख) श्लोक संख्या-7
यथा-बुद्धिमान् नरः किम् इच्छति ? आत्मनः श्रेयः
(क) सः कियन्ति सुखानि इच्छति ? प्रभूतानि
(ख) सः कदापि किं न कुर्यात् ? अहितम् कर्म
(ग) सः केभ्यः अहितं न कुर्यात् ? परेभ्यः
उत्तराणि:
(क) सः कियन्ति सुखानि इच्छति ? प्रभूतानि
(ख) सः कदापि किं न कुर्यात् ? अहितम् कर्म
(ग) सः केभ्यः अहितं न कुर्यात् ? परेभ्यः

प्रश्न 5.
मञ्जूषायाः तद्भावात्मकसूक्ती: विचित्य अधोलिखितकथनानां समक्षं लिखत-
(क) विद्याधनं महत्
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

(ख) आचारः प्रथमो धर्मः
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(ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग्भवेत्।
मनसि एकं वचसि एकं कर्मणि एकं महात्मनाम्।
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।
सं वो मनांसि जानताम्।
विद्याधनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्।
आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः।
उत्तराणि
(क)विद्याधनं महत

  • विद्याधनंसर्वधनप्रधानम्।
  • विद्याधनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद् धनम्।

(ख)आचारः प्रथमो धर्मः

  • आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग् भवेत्।
  • आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणः ।

(ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्

  • मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
  • सं वो मनांसि जानताम्।

प्रश्न 6.
(अ) अधोलिखितानां शब्दानां पुरतः उचितं विलोमशब्दं कोष्ठकात् चित्वा लिखत
शब्दाः विलोमशब्दः
(क) पक्वः ……………….. (परिपक्वः, अपक्वः, क्वथितः)
(ख) विमूढधीः ……………. (सुधीः, निधिः, मन्दधीः)
(ग) कातरः ……………. (अकरुणः, अधीरः, अकातरः)
(घ) कृतज्ञता ……………….. (कृपणता, कृतघ्नता, कातरता)
(ङ) आलस्यम् ……………….. (उद्विग्नता, विलासिता, उद्योगः)
(च) परुषा ……………….. (पौरुषी, कोमला, कठोरा)
उत्तराणि-
शब्दाः – विलोमशब्दः
(क) पक्वः – अपक्वः ।
(ख) विमूढधी: – मन्दधीः।
(ग) कातरः – अकातरः।
(घ) कृतज्ञता – कृतघ्नता।
(ङ) आलस्यम् – उद्योगः।
(च) परुषा – कठोरा।

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