राजनीतिक दल

राजनीतिक दल

अध्याय का सार

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए राजनीतिक दलों __ का होना आवश्यक होता है। लोकतंत्र व राजनीतिक दल पर्यायावाची बन चुके हैं। यदि आज के युग में प्रतिनिधित्मक सरकार ही लोकतांत्रिक सरकार होती है तो ऐसी सरकार के लिए चुनौती का होना जरूरी होता है। हम राजनीतिक दल के बिना चुनावों की कल्पना नहीं कर सकते।

राजनीतिक दल लोगों का वह संगठित समूह है जिसके सदस्य किसी नेता के नेतृत्व में राजनीतिक/सार्वजनिक मामलों पर एक-सी राय रखते हैं तथा अपने साझे व शांतिप्रिय प्रयासों से सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करने के बाद अपनी घोषित । चुनावी नीतियों को लागू करते हैं। जो दल शासन व सरकार बनाता है, उसे शासक दल कहते हैं तथा जा दल सत्ता से बाहर होते हैं, उन्हें विपक्ष कहा जाता है। शासक दल एक राजनीतिक दल की भी हो सकता है तथा कुछेक दलों का गठबन्धन भी हो सकता है।

राजनीतिक दलों के मुख्य कार्यों में चुनावों में उम्मीदवारों का चयन, चुनावी अभियान, सत्ता की प्राप्ति, विपक्ष का निर्माण, सरकार बनाने के पश्चात कानूनों का बनाना, जो कानून नहीं बनाते, उनका सरकार की आलोचना करना, सरकार के हस्तांतरण में आसानी, राजनीतिक चेतना, राजनीतिक शिक्षण आदि का उल्लेख किया जा सकता है। दल एक-दलीय (जहाँ केवल एक दल हो), द्विदलीय (जहाँ मुख्यतया दो राजनीतिक दल हों) बहुदलीय (जहाँ दो अथवा दो से अधिक राजनीतिक दल एकसमान शक्तिशाली हों) एक-दल प्रभुत्व दलीय व्यवस्था, गठबंधीय दलीय व्यवस्था आदि हो सकते हैं।

भारत में राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दल हैं तथा क्षेत्रीय व प्रान्तीय स्तर पर भी। राष्ट्रीय दलों में काँग्रेस पार्टी, भारतीय राजनीतिक पार्टी, जनता दल, बहुजन समाज दल, साम्यवादी दल, मार्क्सवादी दल, राष्ट्रीय काँग्रेस दल आदि के नाम उल्लेखनीय है। प्रान्तीय स्तर पर बने दलों की संख्या भी कुछ कम नहीं है। भारत में प्रान्तीय स्तर पर बने दलों में कुछेक निम्नलिखित हैं: नेशनल कान्फ्रेंस, अकाली दल, लोक दल, समाजवादी दल, तेलुगु-देशम, आदि के नाम उल्लेखनीय है।
राजनीतिक दलों को जन-जागृति का काम करना चाहिए। वोट प्राप्त करने की लालसा में साम्प्रदायिक व जातिगत भावनाओं से दूर रहना चाहिए।

जानने योग्य शब्द तथा तथ्य एवं उनके भाव

राजनीतिक दल : लोगों का ऐसा संगठित समूह जिसमें उनके सार्वजनिक मामलों पर एक से विचार होते हैं तथा जो अपने संयुक्त प्रयासों से व संवैधानिक तरीकों से सत्ता प्राप्त करके अपनी नीतियों को लागू करते हैं।
राजनीतिक दल के तीन तत्व : नेता, सक्रिय सदस्य, अनुयायी अथवा समर्थक
शासक दल : जिस राजनीतिक दल के पास शासन सत्ता हो तथा जो दल सरकार बनाए।
विपक्ष : जो राजनीतिक दल सरकार से बाहर होते हैं तथा शासक दल की नीतियों का विरोध करें।
दो-दलीय व्यवस्था : जिस देश में मुख्यतया दो राजनीतिक दल हों।
गठबन्धनीय दल : वह राजनीतिक दल जो दो अथवा दो से अधिक हों व सरकार बनाने के लिए प्रयासरत हों अथवा सरकार बनाए।
बहुदलीय व्यवस्था : जिस देश में दो से अधिक राजनीतिक दल एक समान सशक्त हों।
राष्ट्रीय राजनीतिक दल : वहराजनीतिक दल जो राष्ट्रीय स्तर में पर कार्यरत हों।
दल-बदल : विधायिका के लिए किसी अन्य दल में प्रवेश
क्षेत्रीय/प्रान्तीय राजनीतिक दल : वह राजनीतिक दल जो क्षेत्रीय व प्रान्तीय स्तर पर बनाए जाएँ तथा उन्हीं स्तरों पर कार्यरत हों।
भारत के कुछ प्रान्तीय दल : नेशनल कान्फ्रेंस, अकाली दल, तेलुगु देशम, डी.एम.के., आल इण्डिया अन्ना डी.एम.के. आदि।
शपथ-पत्र : किसी अधिकारी को सौंपा गया एक दस्तावेज जिसमें वह अपने विषय में निजी सूचनाएँ देता है तथा उनके सही होने की शपथ लेता है तथा उस पर अपने हस्ताक्षर करता है।

राजनीतिक दल Important Questions and Answers

प्रश्न-1.
राजनीतिक दलों के अवगुणों का वर्णन कीजिए। (इन्टैक्स्ट प्रश्नः पृष्ठ : 72)
उत्तर-
राजनीतिक दल पक्षपात करते हैं, भेदभाव व फूट डालते हैं, लोगों को आपस में बाँटने का कार्य करते हैं।

प्रश्न-2.
राजनीतिक दल लोकतंत्र के लिए क्यों आवश्यक
उत्तर-
राजनीतिक दल लोकतंत्र को सफल बनाने के साध न हैं। इसके बिना लोकतंत्र का संचालन नहीं हो सकता।

प्रश्न-3.
राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त टिकट क्यों नहीं देते? क्या यह आंतरिक लोकतंत्र की कमी है? (इन्टैक्ट प्रश्न : पृष्ठ : 83)
उत्तर-
पुरुष-प्रधान देश में प्रायः दल भी महिलाओं को चुनाव लड़ने हेतु टिकट नहीं देते। स्पष्ट है इसका कारण आन्तरिक लोकतंत्र की कमी है।

प्रश्न-4.
राजनीतिक दल किसे कहते हैं?
उत्तर-
राजनीतिक दल लोगों का एक ऐसा संगठित समूह है जो चुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से काम करता है।

प्रश्न-5.
राजनीतिक दल के तीन प्रमुख हिस्से कौन-से हैं?
उत्तर-
राजनीतिक दल के तीन प्रमुख हिस्से निम्नलिखित
(क) नेता, (ख) सक्रिय सदस्य, (ग) अनुयायी या समर्थक।

प्रश्न-6.
दो-दलीय व्यवस्था किसे कहते हैं?
उत्तर-
जिस देश में मुख्यतया दो राजनीतिक दल हों, उसे दो-दलीय व्यवस्था कहते हैं।

प्रश्न-7.
बहुदलीय व्यवस्था किसे कहते हैं?
उत्तर-
जिस देश में दो से अधिक राजनीतिक दल हों, तथा लगभग समान ताकतवर हों, उसे बहुदलीय व्यवस्था कहा जाता

प्रश्न-8.
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना कब हुई थी?
उत्तर-
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना 1885 में हुई थी।

प्रश्न-9.
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लक्ष्यों का मुख्य अजेंडा क्या है?
उत्तर-
धर्म-निरपेक्षता, कमजोर व अल्पसंख्यकों के हितों की प्राप्ति, लोकतंत्र की स्थापना व गुट-निरपेक्षता काँग्रेस के चुनावी अजेंडा हैं।

प्रश्न-10.
राजनीतिक दलों के कोई दो कार्य बताइए।
उत्तर-
1. चुनाव लड़ना, 2. दल की नीतियों व कार्यक्रमों की जनता के सामने रखना।

प्रश्न-11.
शासक दल किसे कहते हैं?
उत्तर-
जो राजनीतिक दल शासन करता है, उसे शासक दल कहा जाता है।

प्रश्न-12.
दो गठबंधनों वाली बहुदलीय व्यवस्था किसे कहा जाता है?
उत्तर-
सरकार बनाने हेतु जब कुछ राजनीतिक दल गठबंध नं बनाते हैं, उन्हें गठबंधीय वाली बहुदलीय व्यवस्था कहा जाता

प्रश्न-13.
कनाडा में राजनेताओं के विषय में लोगों की क्या राय है? .
उत्तर-
एक आंकड़े के अनुसार 98% कनाडावासी राजनेताओं को पसंदनहीं करते।

प्रश्न-14.
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना कब हुई थी? उसकी नीति में प्रमुख तत्व क्या है?

भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 1980 में हुई थी। इसकी नीति का प्रमुख तत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (या हिन्दुत्व)

प्रश्न-15.
बहुजन समाज पार्टी का गठन कब हुआ था? इसे किस ने गठित किया?
उत्तर-
गठन 1984 में हुआ था।

प्रश्न-16.
भारतीय मार्क्सवादी पार्टी की स्थापना कब हुई। उसकी आस्था किस विचारधारा में है?
उत्तर-
भारतीय मार्क्सवादी पार्टी की स्थापना 1964 में हुई थी। इसकी आस्था मार्क्सवाद-लेनिनवाद में है।

प्रश्न-17.
भारतीय साम्यवादी दल को कब गठित किया गया था?
उत्तर-
1925 में

प्रश्न-18.
राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी की नीतियों का ब्यौरा दीजिए।
उत्तर-
लोकतंत्र, गाँधीवादी धर्म-निरपेक्षता, समता, सामाजिक न्याय और संघवाद।

प्रश्न-19.
किशनजी अब इस दुनिया में नहीं हैं। इन चारों कार्यकर्ताओं के बारे में आपकी क्या राय है? क्या उन्हें नया राजनीतिक दल बनाना चाहिए? क्या कोई राजनीतिक दल राजनीति में नैतिक दल बन सकता है? यह दल कैसा होना चाहिए? (इन्टैक्सट प्रश्न : पृष्ठ : 70)
उत्तर-
किशनजी एक महत्त्वपूर्ण आन्दोलनकारी थे। वह लोगों के मित्र, राजनीतिक दार्शनिक एवं नैतिक मार्गदर्शक भी थे। उनका मत था कि लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक व आर्थिक मामलों से जुड़े आन्दोलनों में भाग लेना चाहिए। वस्तुतः वह किसी नयी प्रकार की राजनीतिक पार्टी के बजाए एक वैकल्पिक प्रकार की राजनीति चाहते थे। राजनीतिक दलों में खोट होता है. वह वोट प्राप्त करने के लिए किसी भी अनैतिक प्रकार की भूल कर सकते हैं। परन्तु एक नयी प्रकार की राजनीति जो नैतिकता व लोकसेवा पर आधारित होगी, उस से राज्य व समाज दोनों में सुधार सम्भव हो पाएगा।

प्रश्न-20.
क्या आप दो-दलीय व्यवस्था, दो गठबंधनों वाली बहुदलीय व्यवस्था व बहुदलीय व्यवस्था के लिए कम से कम दो राज्यों के नाम बता सकते हैं? (इन्टैक्सट प्रश्न : पृष्ठ : 77)
उत्तर-

  • दो-दलीय व्यवस्थाः संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन।
  • दो गठबंधनीय वाली बहुदलीय व्यवस्थाः बेल्जियम, भारत
  • बहुदलीय व्यवस्थाः स्विट्जरलैंड, फ्राँस

प्रश्न-21.
अधिकांश कार्टूनों में नेताओं का मजाक उड़ाया जाता है। क्या आप बता सकते हैं कि इस हिस्से में वर्णित चुनौतियाँ किस कार्टून में आई हैं? यह इटली, अमेरिका तथा भारत से सम्बन्धित हैं। (इन्टैक्सट प्रश्न : पृष्ठ : 85)
उत्तर-
राजनीतिक दल अपने चुनावी अभियानों में काफी रुपए/धन खर्च करते हैं। उन्होंने राजनीति को व्यवसाय (एक चुनौती) बना दिया है। एक कार्टून का सम्बन्ध नेताओं द्वारा ध न का ब्यौरा देते हुए दिखाया गया है। दूसरे कार्टून द्वारा चुनावों में धन की ताकत को बयान किया गया है।

प्रश्न-22.
क्या आप राजनीतिक दलों के सुधार हेतु अनुशासन पर जोर देने के पक्ष में हैं? (इन्टैक्सट प्रश्न: पृष्ठः 86)
उत्तर-
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का सादा महत्त्व होता है। लोकतंत्र की सफलता, बहुत सीमा तक, राजनीतिक दलों की स्वच्छ प्रणाली, उनके द्वारा ईमानदारी से काम करने व भ्रष्टाचार से जुड़ी गतिविधियों से दूर पर निर्भर करती है। राजनीतिक दलों को अनुशासनात्मक ढंग से अपनी गतिविधियाँ चलानी चाहिए तथा उन्हें भी अनुशासन को घेरे में लिया जाना चाहिए।

प्रश्न-23.
राजनीतिक दल क्यों जरूरी हैं?
उत्तर-
जन-साधारण के लिए लोकतंत्र व राजनीतिक दल एक ही रूप के होते हैं। हम राजनीतिक दलों के बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना ही नहीं कर सकते। करीब 100 साल पहले दुनिया के बस कुछ ही देशों में और वह भी गिनती के राजनीतिक दल थे। आज गिनती के ही देश ऐसे हैं जहाँ राजनीतिक दल नहीं हैं। दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल सर्वव्यापी हो गए हैं।

प्रश्न-24.
राजनीतिक दल का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक दल को लोगों के ऐसे संगठित समूह के रूप में बताया जाता है जो चुनाव लड़ने के बाद सरकार में सत्ता प्राप्त करते हैं। इसके सदस्य सार्वजनिक मामलों में एक से विचार रखते हैं। शांतिपूर्ण व संवैधानिक तरीकों से दल सत्ता प्राप्त कर अपनी चुनावी नीतियों को प्रभावी रूप देते हैं। दल के तीन प्रमुख हिस्से होते हैं : (i) नेता, (ii) सक्रिय सदस्य, (iii) अनुयायी या समर्थक।

प्रश्न-25.
राजनीतिक दलों के महत्त्व की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक दलों के महत्त्व को भूलाना कठिन है। यदि दल न हो तो हमें उसकी उपयोगिता संदिग्ध होगी। निर्वाचित प्रतिनिधि सिर्फ अपने निर्वाचन क्षेत्रों में किए गए कामों के लिए जवाबदेह होंगे। लेकिन, देश कैसे चले इसके लिए कोई उत्तरदायी नहीं होगा। उम्मीदवार स्वतंत्र या निर्दलीय होंगे। तब, इनमें से कोई भी बड़े नीतिगत बदलाव के बारे में लोगों से चुनावी वायदे करने की स्थिति में नहीं होगा। सरकार बन जाएगी पर वह सरकार कभी भी स्थायी नहीं होगा। .

प्रश्न-26.
लोकतंत्रीय व्यवस्था में एक-दलीय व्यवस्था क्यों अच्छा विकल्प नहीं हैं?
उत्तर-
हम एक-दलीय व्यवस्था को अच्छा विकल्प नहीं मान सकते क्योंकि यह लोकतांत्रिक विकल्प नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कम-से-कम दो दलों को राजनीतिक सत्ता के लिए चुनाव में प्रतिद्वंद्विता करने की अनुमति तो होनी ही चाहिए। साथ ही उन्हें सत्ता में आ सकने का पर्याप्त अवसर भी रहना चाहिए।

प्रश्न-27.
दो-दलीय व्यवस्था की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
कुछ देशों में सत्ता आमतौर पर दो मुख्य दलों के बीच ही बदलती रहती है। वहाँ अनेक दूसरी पार्टियों हो सकती हैं, वे भी चुनाव लड़कर कुछ सीटें जीत सकती हैं पर सिर्फ दो ही दल, बहमत पाने और सरकार बनाने के प्रबल दावेदार होते हैं। अमरीका और ब्रिटेन में ऐसी ही दो-दलीय व्यवस्था है।

प्रश्न-28.
बहुदलीय, व्यवस्था किसे कहते हैं?
उत्तर-
जहाँ दो से अधिक राजनीतिक दल लगभग एक-जैसी शक्ति रखते हो तथा जिन्हें लगभग एक जैसा समर्थन प्राप्त हो,
उस व्यवस्था को बहुदलीय व्यवस्था कहा जाता है। भारत में _बहुदलीय व्यवस्था है। हमारे देश में चुनावों से पहले कुछेक
राजनीतिक दल गठबंधन बना कर चुनाव लड़ते हैं तथा सरकार बनाने का प्रयास भी करते हैं।

प्रश्न-29.
किसी भी देश में अमुख्य दलीय व्यवस्था के बनने के पीछे क्या कारण होता हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर-
हर देश अपनी विशेष परिस्थितियों के अनुरूप दलीय व्यवस्था है तो उसका कारण यह है कि दो-तीन पार्टियाँ इतने बड़े मुल्क की सारी सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं को समेट पाने में अक्षम हैं। हर मुल्क और हर स्थिति में कोई एक ही आदर्श प्रणाली चले यह संभव नहीं है।

प्रश्न-30.
राजनीतिक दलों के विषय में लोगों की क्या राय होती है?
उत्तर-
दक्षिण एशिया की जनता राजनीतिक दलों पर बहुत भरोसा नहीं करती। जो लोग दलों पर ‘एकदम भरोसा नहीं’ ‘बहुत भरोसा नहीं’ के पक्ष में बोले उनका अनुपात ‘कुछ भरोसा’ या ‘पूरा भरोसा’ बताने वालों से काफी ज्यादा था। यही बात ज्यादातर लोकतंत्रों पर लागू होती है। पूरी दुनिया में राजनीतिक दल ही एक ऐसी संस्था है जिस पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं।

प्रश्न-31.
क्या आप जानते हैं कि राजनीतिक दलों के कामकाज में लोगों की भागीदारी बढ़ी है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक दलों के कामकाज में लोगों की भागीदारी का स्तर काफी ऊँचा है। खुद को किसी राजनीतिक दल का सदस्य बताने वाले भारतीयों का अनुपात कनाड़ा, जापान, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों से भी ज्यादा है। पिछले तीन दशकों के दौरान भारत में राजनीतिक दलों की सदस्यता का अनुपात धीरे-धीरे बढ़ता गया है। खुद को किसी राजनीतिक दल का करीबी बताने वालों का अनुपात भी इस अवधि में बढ़ता गया

प्रश्न-32.
राष्ट्रीय दल व प्रान्तीय दलों में मुख्य भेद बताइए। इनके उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीय दल वह राजनीतिक दल होते हैं जिनकी नीतियाँ व कार्यक्रम पूरे देश से सम्बन्धित होते हैं। प्रान्तीय राजनीतिक दल प्रान्तीय व क्षेत्रीय रूप से होते हैं तथा उनका प्रभाव उसी प्रान्त व क्षेत्र तक ही रहता है। भारत में राष्ट्रीय दल है: भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, साम्यवाद व मावर्सवादी दल। प्रान्तीय राजनीतिक दलों में नेशनल कान्फ्रेंस, अकाली दल, तेलुगुदेशम आदि उल्लेखनीय

प्रश्न-33.
भारत में साम्यवादी दलों का मुख्य चुनावी लक्ष्य क्या रहा है?
उत्तर-
1925 में भारतीय साम्यवादी दल का गठन हुआ। 1964 में इस दल में फूट के परिणामस्वरूप इसको एक शाखा मार्क्सवादी साम्यवादी दल के रूप में उभर आयी। यह दोनों साम्यवादी दल वामपंथी मोर्चे के गठन के फलस्वरूप मिलकर काम कर हैं। इनका मुख्य चुनावी लक्ष्य मजदूरों व किसानों हेतु सामाजवाद की स्थापना है। यह पूँजीवाद को नियंत्रित रखना चाहती हैं। स्त्री-शक्ति के समर्थक यह दल शासन में दायित्वपूर्ण व्यवस्था का पक्ष लेते हैं।

प्रश्न-34.
भारतीय जनता पार्टी के चुनावी कार्यक्रम में किन्हीं पाँच का उल्लेख करें।
उत्तर-

  1. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर महत्त्व
  2. सभी धर्मों को मानने वालों के लिए समान नागरिक संहिता;
  3. गाँधीवादी अर्थव्यवस्था;
  4. गुट-निरेपक्षता को स्वच्छ रूप दे लागू करना;
  5. वैश्वीकरण व निजीकरण व उदारीकरण का समर्थन।

प्रश्न-35.
बहुजन समाज पार्टी किन नेताओं के विचारों से प्रेरित हई हैं? इस पार्टी के मुख्य लक्ष्य क्या हैं?
उत्तर-
बहुजन समाज पार्टी साहू महाराज, महात्मा फूले, पेरियार रामास्वामी नायक, बाबा साहेब अम्बेडकर आदि नेताओं के विचारों से प्रेरित हुई है। इस पार्टी ने 2004 के लोकसभा चुनावों में सीटें प्राप्त की थीं। यह दल दलित वर्गों के हित को अपना प्रमुख लक्ष्य मानती है। वह दल पिछड़ी जातियाँ, आदिवासियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सत्ता प्राप्त करना चाहती हैं।

प्रश्न-36.
राजनीतिक दलों के मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. दल चुनाव लड़ते हैं। अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खड़ा किए गए उम्मीदवारों के बीच लड़ा जाता है। राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव कई तरीकों से करते हैं। अमरीका जैसे कुछ देशों में उम्मीदवार का चुनाव दल के सदस्य और समर्थक करते हैं। अब इस तरह से उम्मीदवार चुनने वाले देशों की संख्या बढ़ती जा रही है। अन्य देशों, जैसे भारत में, दलों के नेता ही उम्मीदवार चुनते हैं।
2. दल अलग-अलग नीतियों और कार्यक्रमों को मतदाताओं के सामने रखते हैं और मतदाता अपनी पसंद की नीतियाँ और कार्यक्रम चुनते हैं।
3. पार्टियाँ देश के कानून निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। कानूनों पर औपचारिक बहस होती है और उन्हें विध यिका में पास करवाना पड़ता है लेकिन विधायिका के अधि कतर सदस्य किसी-न-किसी दल के सदस्य होते हैं। इस कारण के अपने दल के नेता के निर्देश पर फैसला करते हैं। . 4. दल ही सरकार बनाते और चलाते हैं। शासकीय मामलों से जुड़ी नीतियाँ और बड़े फैसलों के मामले में निर्णय राजनेता ही लेते हैं और ये नेता विभिन्न दलों के होते हैं। पार्टियाँ नेता
चुनती हैं, उनको प्रशिक्षित करती हैं और फिर पार्टी के सिद्धांतों और कार्यक्रम के अनुसार फैसले करने के लिए उन्हें मंत्री बनाती हैं ताकि वे पार्टी की इच्छा के अनुसार सरकार चला सकें।
5. चुनाव हारने वाले दल शासक दल के विरोधी पक्ष की भूमिका निभाते हैं। सरकार की गलत नीतियों और असफलताओं की आलोचना करने के साथ वह अपनी अलग राय भी रखते हैं। विपक्षी दल सरकार के खिलाफ आम जनता को भी गोलबंद करते हैं।
6. जनमत-निर्माण में दल महत्त्वपूर्ण निभाते हैं। वे मुद्दों को उठाते और उन पर बहस करते हैं। विभिन्न दलों के लाखों कार्यकर्ता देश-भर में बिखरे होते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों में उनके मित्र संगठन या दबाव-समूह भी काम करते रहते हैं। दल कई बार लोगों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन भी करते हैं। अक्सर विभिन्न दलों द्वारा रखी जाने वाली राय के इर्द-गिर्द ही समाज के लोगों की राय बनती जाती है।
7. इल ही सरकारी मशीनरी और सरकार द्वारा चलाए जाने वाले कल्याण कार्यक्रमों तक लोगों की पहुँच बनाते हैं। एक साधारण नागरिक के लिए किसी सरकारी अधिकारी की तुलना में किसी राजनीतिक कार्यकर्ता से जान-पहचान बनाना, उससे संपर्क साधना आसान होता है। इसी कारण लोग दलों पर पूरा विश्वास न करते हुए भी उन्हें अपने करीब मानते हैं। दलों को भी हर हाल में लोगों की माँगों और जरूरतों पर ध्यान देना होता है वरना अगले चुनाव में लोग उन्हें धूल चटा सकते हैं।

प्रश्न-37.
राजनीतिक दलों को लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
राजनीतिक दलों का उदय प्रतिनिधित्व पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के उभार के साथ जुड़ा है। हम पढ़ चुके हैं कि बड़े समाजों के लिए प्रतिनिधित्व आधारित लोकतंत्र की जरूरत होती है। जब समाज बड़े और जटिल हो जाते हैं तब उन्हें विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विचारों को समेटने और सरकार की नजर में लाने के लिए किसी माध्यम या एजेंसी की जरूरत होती है। विभिन्न जगहों से आए प्रतिनिधियों को साथ करने की जरूरत होती है ताकि एक जिम्मेवार सरकार का गठन हो सके। उन्हें सरकार का समर्थन करने या उस पर अंकुश रखने, नीतियाँ बनवाने और नीतियों का समर्थन करने या उस पर अंकुश रखने, नीतियाँ बनवाने और नीतियों का समर्थन अथवा विरोध करने के लिए उपकरणों की जरूरत होती है। प्रत्येक प्रतिनिधि-सरकार की ऐसी जो भी जरूरतें होती हैं, राजनीतिक दल उनको पूरा करते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि राजनीतिक दल लोकतंत्र की एक अनिवार्य शर्त हैं।

प्रश्न-38.
भारत में बनी राष्ट्रीय पार्टी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर-
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को आमतौर पर काँग्रेस पार्टी कहा जाता है। यह एक पुराना राजनीतिक दल है। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अवकाश प्राप्त एक अधिकार ए.आ. ह्यूम ने बम्बई में 1885 में इस दल का गठन किया। इसमें कई बार विभाजन हुआ। स्वतंत्रता दल में कई बार विभाजन हए हैं। आजादी के बाद राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर अनेक दर्शकों तक इसने प्रमुख भूमिका निभाई है। जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में इस दल ने भारत को एक आधुनिक धर्म-निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का प्रयास किया। 1971 तक लगातार और फिर 1980 से 1989 तक इसने देश पर शासन किया।

1989 के बाद से इस दल के जन-समर्थन में कमी आई पर अभी यह पूरे देश और समाज के सभी वर्गों में अपना आधार बनाए हुए हैं। अपने वैचारिक रुझान में मध्यमार्गी (न वामपंथी न दक्षिणपंथी) इस दल ने धर्म-निरपेक्षता और कमजोर वर्गों तथा अल्पसंख्यक समुदायों के हितों को अपना मुख्य अजेंडा बनाया है। यह दल नयी आर्थिक नीतियों का समर्थक है पर इस बात को लेकर भी सचेत है कि इन नीतियों का गरीब और कमजोर वर्गों पर बुरा असर न पड़े। 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में 145 सीटें जीतकर भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। अभी केंद्र में शासन करने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का नेतृत्व यही दल कर रहा है।

प्रश्न-39.
भारतीय जनता पार्टी के विषय में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
पुराने भारतीय जनसंघ को पुनर्जीवित करके 1980 में यह पार्टी बनी। भारत की प्राचीन संस्कृति और मूल्यों से प्रेरणा लेकर मजबूत और आधुनिक भारत बनाने का लक्ष्य, भारतीय राष्ट्रवाद और राजनीति की इसकी अवधारणा में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (या हिंदुत्व) एक प्रमुख तत्व है। पार्टी जम्मू और कश्मीर को क्षेत्रीय और राजनीतिक स्तर पर विशेष दर्जा देने के खिलाफ है। यह देश में रहने वाले सभी धर्म के लोगों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने और धर्मातरण पर रोक लगाने के पक्ष में है। 1990 के दशक में इसके समर्थन का आधार काफी व्यापक हुआ। पहले देश के उत्तरी और पश्चिमी तथा शहरी इलाकों तक ही सिमी रहने वाली इस पार्टी ने इस दशक में दक्षिण, पूर्व, पूर्वोत्तर तथा देश के ग्रामीण इलाकों में अपना आध पर बढ़ाया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता की हैसियत से यह पार्टी 1998 में सत्ता में आई। गठबंधन में कई प्रांतीय और क्षेत्रीय दल शामिल थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में यह पार्टी पराजित हुई और अभी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल है।

प्रश्न-40.
बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कब हुई? इस पार्टी के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
स्व. कांशीराम के नेतृत्व में 1984 में गठन। बहुजन समाज जिसमें दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियाँ और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं, के लिए राजनीतिक सत्ता पाने का प्रयास और उनका प्रतिनिधित्व करने का दावा। पार्टी साहू महाराज, महात्मा फुले, पेरियार रामास्वामी नायकर और बाबा साहब आंबेडकर के विचारों और शिक्षाओं से प्रेरणा लेती है। दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों के कल्याण और उनके हितों की रक्षा के मुद्दों पर सबसे ज्यादा सक्रिय इस पार्टी का मुख्य आधार उत्तर प्रदेश में है, पर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, दिल्ली और पंजाब में भी यह पार्टी पर्याप्त ताकतवर है। अलग-अलग पार्टियों से अलग-अलग अवसरों पर समर्थन लेकर इसने उत्तर प्रदेश में तीन बार सरकार बनाई। इस दल को 2004 के लोकसभा चुनाव में करीब 5 फीसदी वोट और 19 सीटें मिलीं।

प्रश्न-41.
भारत के साम्यवादी दलों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारतीय मार्क्सवादी दल की स्थापना 1964 में हुई। यह दल समाजवाद धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र की समर्थक तथा साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता की विरोधी है। यह पार्टी भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय का लक्ष्य साधने में लोकतांत्रिक चुनावों को सहायक और उपयोगी मानती है। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में बहुत मजबूत आधार। गरीबों, कारखाना मजदूरों, खेतिहर मजदूरों और बुद्धिजीवियों के बीच अच्छी पकड़। यह पार्टी देश में पूँजी और सामानों की मुक्त आवाजाही की अनुमति देने वाली नयी आर्थिक नीतियों की आलोचक है। पश्चिम बंगाल में लगातार 30 वर्षों से शासन में। 2004 के चुनाव में इसने करीब 6 फीसदी वोट और लोकसभा की 43 सीटें हासिल की। यह पार्टी अभी केंद्र की संप्रग सरकार का बाहर से समर्थन कर रही है और इस सरकार में शामिल नहीं है।

भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना 1925 में हुई। यह दल मार्क्सवाद-लेनिनवाद, धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र में आस्था एवं अलगाववादी और सांप्रदायिक ताकतों की विरोधी है। यह पार्टी संसदीय लोकतंत्र को मजदूर वर्ग, किसानों और गरीबों के हितों को आगे बढ़ाने का एक उपकरण मानती है। 1964 की फूट (जिसमें माकपा इससे अलग हुई) के बाद इसका जनाध पर सिकुड़ता चला गया लेकिन केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में अभी भी ठीक-ठाक स्थिति। बहरहाल, इसका समर्थन धीरे-धीरे कम होता गया है। 2004 के चुनाव में इसे 1.4 फीसदी वोट और लोकसभा की 10 सीटें हासिल हुई। मजबूत वाम मोर्चा बनाने के लिए सभी वामपंथी दलों को साथ लाने की पक्षधर। अभी केंद्र की संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है।

प्रश्न-42.
राजनीतिक दलों में सुधार कैसे लाया जा सकता
उत्तर-
राजनीतिक दलों में सुधार हेतु निम्नलिखित प्रयास किए जा सकते हैं:

  • विधायकों और सांसदों को दल-बदल करने से रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया। निर्वाचित प्रतिनिधियों के मंत्रीपद या पैसे के लोभ में दल-बदल करने में आई तेजी को देखते हुए ऐसा किया गया। नए कानून के अनुसार अपना दल-बदलने वाले सांसद या विधायक को अपनी सीट भी गँवानी होगी। इस नए कानून से दल-बदल में कमी आई है पर इससे पार्टी में विरोध का कोई स्वर उठाना और भी मुश्किल हो गया है पार्टी नेतृत्व जो कोई फैसला करता है, सांसद और विधायक को उसे मानना ही होता है।
  • चुनाव आयोग ने एक आदेश के जरिए सभी दलों के लिए सांगठनिक चुनाव कराना और आयकर का रिटर्न भरना जरूरी बना दिया है। दलों ने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है, पर कई बार ऐसा सिर्फ खानापूरी करने के लिए होता है। यह बात अभी नहीं कही जा सकती है कि इससे राजनीतिक दलों में अंदरूनी लोकतंत्र मजबूत हुआ है। इनके अलावा राजनीतिक दलों में सुधार के लिए अक्सर कई कदम सुझाए जाते हैं।
  • राजनीतिक दलों के आंतरिक कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। सभी दल अपने सदस्यों की सूची रखें, अपने संविधान का पालन करें पार्टी में विवाद की स्थिति में एक स्वतंत्र प्राधिकारी को पंच बनाएँ और सबसे बड़े पदों के लिए खुला चुनाव कराएँ-यह व्यवस्था अनिवार्य को जानी चाहिए।
  • राजनीतिक दल महिलाओं को एक खास न्यूनतम अनुपात में (करीब एक-तिहाई) जरूर टिकट दें। इसी प्रकार दल के प्रमुख पदों पर भी औरतों के लिए आरक्षण होना चाहिए।
  • चुनाव का खर्च सरकार उठाए। सरकार दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन दे। यह मदद पेट्रोल, कागज, फोन वगैरह के रूप में भी हो सकती है या फिर पिछले चुनाव में मिले मतों के अनुपात में नकद पैसा दिया जा सकता है।
  • दबाव-समूहों द्वारा लोगों का राजनीतिक दलों पर सदैव बना रहना चाहिए ताकि दल लोगों के प्रति सजग रहें। जो राजनीतिक दल में सुधार लाना चाहते हैं, उन्हें स्वयं राजनीतिक दलों में प्रवेश करके जरूरी सुधार लाने के प्रयास करने चाहिए।

राजनीतिक दल Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की विभिन्न भूमिकाओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की अनेक प्रकार की भूमिकाएँ होती हैं। इन भूमिकाओं को निम्नलिखित बताया जा सकता है:

  • राजनीतिक दल लोकतंत्र की सफलता हेतु चुनावों की व्यवस्था को सम्भव बनाते हैं।
  • वे चुनावों के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को लोगों के समक्ष लाते तथा चुनावी कार्यक्रम को पूरा करने में सहायता करते हैं।
  • वे चुनावों के पश्चात्, सरकार के गठन व उसके विपक्ष बनाने में भूमिका निभाते हैं।
  • वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरा रूप देने के लिए में सहयोग देते हैं अर्थात सरकार के संचालन में मदद करते हैं।
  • लोकतंत्र के सफल संचालन हेतु राजनीतिक दल लोगों में राजनीतिक चेतना जाग्रत करते हैं।
  • शासक दल शासन करतो है तथा विपक्ष शासक दल की नीतियों व सरकार की आलोचना करते हैं।

प्रश्न 2.
राजनीतिक दलों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? .
उत्तर-
राजनीतिक दलों के सामने की चुनौतियों को निम्नलिखित बताया जा सकता है: पहली चुनौती है पार्टी के अन्दर आन्तरिक लोकतंत्र को बनाना। अब यह प्रवृत्ति बन गई है कि सारी ताकत एक या कुछेक नेताओं के हाथ में सिमट जाती है। पार्टियों के पास न सदस्यों की खुली सूची होती है, न नियमित रूप से सांगठनिक बैठकें होती हैं। इनके आंतरिक चुनाव भी नहीं होते। कार्यकर्ताओं से वे सूचनाओं का आदान-प्रदान भी नहीं करते। सामान्य कार्यकर्ता अनजान ही रहता है कि पार्टी के अंदर क्या चल रहा है। उसके पास न तो नेताओं से जुड़कर फैसलों को प्रभावित करने की ताकत होती है न ही कोई और माध्यम। परिणामस्वरूप पार्टी के नाम पर सारे फैसले लेने का अधिकार उस पार्टी के नेता हथिया लेते हैं। चूँकि कुछेक नेताओं के पास ही असली ताकत होती है इसलिए जो उनसे असहमत होते हैं उनका पार्टी में टिके रह पाना मुश्किल हो जाता है। पार्टी के सिद्धांतों और नीतियों से निष्ठा की जगह नेता से निष्ठा ही ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाती है।

दूसरी चुनौती पहली चुनौती से ही जुड़ी है-यह है वंशवाद की चुनौती। चूँकि अधिकांश दल अपना कामकाज पारदर्शी तरीके से नहीं करते, इसलिए सामान्य कार्यकर्ता के नेता बनने और ऊपर आने की गुंजाइश काफी कम होती है। जो लोग नेता होते हैं वे अनुचित लाभ लेते हुए अपने नजदीकी लोगों और यहाँ तक कि अपने ही परिवार के लोगों को आगे बढ़ाते हैं। अनेक दलों में शीर्ष पद पर हमेशा एक ही परिवार के लोग आते हैं। यह दल के अन्य सदस्यों के साथ अन्याय है। यह बात लोकतंत्र के लिए भी अच्छी नहीं है क्योंकि इससे अनुभवहीन और बिना जनाधार वाले लोग ताकत वाले पदों पर पहुँच जाते हैं। यह प्रवृत्ति कुछ पहले के लोकतांत्रिक देशों सहित कमोबेश पूरी . दुनिया में दिखाई देती है।

तीसरी चुनौती दलों में, (खासकर चुनाव के समय) पैसा और अपराधी तत्वों की बढ़ती घुसपैठ की है। चूँकि पार्टियों की सारी चिंता चुनाव जीतने की होती है, अतः इसके लिए कोई भी जायज-नाजायज तरीका अपनाने से वे परहेज नहीं करतीं। वे ऐसे ही उम्मीदवार उतारती हैं जिनके पास काफी पैसा हो या जो पैसे जुटा सकें। किसी पार्टी को ज्यादा धन देने वाली कंपनियाँ और अमीर लोग उस पार्टी की नीतियों और फैसलों को भी प्रभावित करते है। कई बार पार्टियाँ चुनाव जीत सकने वाले अपराधियों का समर्थन करती हैं या उनकी मदद लेती हैं। दुनिया भर में लोकतंत्र के समर्थक लोकतांत्रिक राजनीति में अमीर लोग और बढी कंपनियों की बढ़ती भूमिका को लेकर चिंतित हैं।

चौथी चुनौती पार्टियों के बीच विकल्पहीनता की स्थिति की है। सार्थक विकल्प का मतलब होता है कि विभिन्न पार्टियों की नीतियों और कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण अंतर हो। हाल के वर्षों में दलों के बीच वैचारिक अंतर कम होता गया है और यह प्रवृत्ति दुनिया भर में दिखती है। जैसे, ब्रिटेन की लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बीच अब बड़ा कम अंतर रह गया है। दोनों दल बुनियादी मसलों पर सहमत हैं और उनके बीच अंतर बस ब्यौरों का रह गया है कि नीतियाँ कैसे बनाई जाएँ और उन्हें कैसे लागू किया जाए। अपने देश में भी सभी बड़ी पार्टियों के बीच आर्थिक मसलों पर बड़ा कम अंतर रह गया है। जो लोग इससे अलग नीतियाँ चाहते हैं उनके लिए कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। कई बार लोगों के पास एकदम नया नेता चुनने का विकल्प भी नहीं होता क्योंकि वही थोड़े से नेता हर दल में आते-जाते रहते हैं।

प्रश्न 3.
राजनीतिक दल अपना कामकाज बेहतर ढंग से करे, इसके लिए उन्हें मजबूत बनाने के कुछ सुझाव दें।
उत्तर-
राजनीतिक दल अपना कामकाज बेहतर ढंग से करे, इसके लिए उन्हें मजबूत बनाने के कुछ सुझाव निम्नलिखित दिए जा सकते हैं:

  • दल की लोकतांत्रिक प्रकार की रचना की जाए।
  • दल में सदस्यों की संख्या का ठीक-ठीक ब्यौरा रखा जाए।
  • दल में सामाजिक चुनाव कराएँ जाने चाहिए।
  • दल व लोगों के बीच संपर्क बनाए रखा जाना चाहिए।
  • दल की नीतियाँ व सिद्धांतों की अवहेलना करने वालों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए।

प्रश्न 4.
दल का क्या अर्थ होता है?
उत्तर-
राजनीतिक व सार्वजनिक मामलों पर एक से विचार रखने वाले लोगों का ऐसा संगठन जो अपने संयुक्त व सांझे प्रयत्नों द्वारा सरकार की सत्ता को संवैधानिक व शांतिपूर्ण ढंग से प्राप्त कर अपनी घोषित नीतियों को लागू करताहै। राजनीतिक दल के तीन मुख्य तत्व होते हैं : दल का नेता, सक्रिय सदस्य व अनुयायी अर्थात समर्थक।

प्रश्न 5.
किसी भी राजनीतिक दल में क्या गुण होते
उत्तर-
राजनीतिकदलों के गुणों को, संक्षेप में, निम्नलिखित बताया जा सकता है:

  • लोकतंत्र के संचालन व उसकी सफलता में सहायक;
  • सरकार के निर्माण व उसके संचालन में सहयोग;
  • लोगों में राजनीतिक चेतना में वृद्धि में मदद;
  • सरकार व लोगों के बीच कड़ी का कार्य करना;
  • सरकार में सत्ता के हस्तांतरण का शांतिपूर्ण तरीका प्रदान करना।

प्रश्न 6.
चुनाव लड़ने और सरकार में सत्ता सँभालने के लिए एकजुट हुए लोगों के समूह को ………. कहते हैं।
उत्तर-
राजनीतिक दल।

प्रश्न 7.
पहली सूची [ संगठन/दल ] और दूसरी सूची [गठबंधन/मोर्चा] के नामें का मिलान करें और नीचे दिए गए कूट नामों के आधार पर सही उत्तर ढूँढ़ें:

सूची-I — सूची-II

1. काँग्रेस पार्टी — (क) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन
2. भारतीय जनता पार्टी — (ख) प्रांतीय दल
3. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — (ग) संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन
4. तेलुगुदेशम पार्टी — (घ) वाम मोर्चा

HBSE 10th Class Social Science Solutions Civics Chapter 6 राजनीतिक दल 1


उत्तर-‘ग’ सही है।

प्रश्न 8.
इनमें से कौन बहुजन समाज पार्टी का संस्थापक
(क) कांशीराम
(ख) साहू महाराज
(ग) बी.आर.अम्बेडकर
(घ) ज्योतिबा फूले
उत्तर-
(क) कांशीराम

प्रश्न 9.
भारतीय जनता पार्टी का मुख्य प्रेरक सिद्धांत क्या है?
(अ) बहुजन समाज
(ब) क्रांतिकारी-लोकतंत्र
(स) सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
(द) आधुनिकता
उत्तर-
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद।

प्रश्न 10.
पार्टियों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर गौर करें:
(अ) राजनीतिक दलों पर लोगों का ज्यादा भरोसा नहीं है।
(ब) दलों में अक्सर बड़े नेताओं के घोटलों की गूंज सुनाई देती है।
(स) सरकार चलाने के लिए पार्टियों का होना जरूरी नहीं।
इन कथनों में से कौन सही है?
(क) अ, ब और स
(ख) अ और ब
(ग) ब और स
(घ) अ और स
उत्तर-
(ग) ‘ब’ तथा ‘स’ सही है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित उदाहरण को पढें और नीचे दिए गए प्रश्नों का जवाब दें:
मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। गरीबों के आर्थिक और सामाजिक विकास के प्रयासों के लिए उन्हें अनेक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। उन्हें और उनके द्वारा स्थापित ग्रामीण बैंक को संयुक्त रूप से वर्ष 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। फरवरी 2007 में उन्होंने एक राजनीतिक दल बनाने और संसदीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनका उद्देश्य सही नेतृत्व को उभारना, अच्छा शासन देना और नए बांगलादेश का निर्माण करना है। उन्हें लगता है कि पारंपरिक दलों से अलग एक नए राजनीतिक दल से ही नई राजनीतिक संस्कृतिक पैदा हो सकती है। उनका दल निचले स्तर से लेकर ऊपर तक लोकतांत्रिक होगा। नागरिक शक्ति नामक इस नये दल के गठन से बांग्लादेश में हलचल मच गई है। उनके फैसले को काफी लोगों ने पंसद किया तो अनेक को यह अच्छा नहीं लगा। एक सरकारी अधिकारी शाहेदुल इस्लाम ने कहा, “मुझे लगता है कि अब बांग्लादेश में अच्छे और बुरे के बीच चुनाव करना संभव हो गया है। अब एक अच्छी सरकार की उम्मीद की जा सकती है। यह सरकार न केवल भ्रष्टाचार से दूर रहेगी बल्कि भ्रष्टाचार और काले धन की समाप्ति को भी अपनी प्राथमिकता बनाएगी।”
पर दशकों से मुल्क की राजनीति में रुतबा रखने वाले पुराने दलों के नेताओं में संशय है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के एक बड़े नेता का कहना है: “नोबेल पुरस्कार जीतने पर क्या बहस हो सकती है पर राजनीति एकदम अलग चीज है। एकदम चुनौती भरी और अक्सर विवादास्पद।” कुछ अन्य लोगों का स्वर
और कड़ा था। वे उनके राजनीति में आने पर सवाल उठाने लगे। एक राजनीतिक प्रेक्षक ने कहा, “देश से बाहर की ताकतें उन्हें राजनीति पर थोप रही हैं।” ।

क्या आपको लगता है कि यूनुस ने नयी राजनीतिक पार्टी बनाकर ठीक किया?

क्या आप विभिन्न लोगों द्वारा जारी बयानों और अंदेशों से सहमत हैं? इस पार्टी को दूसरों से अलग काम करने के लिए खुद को किस तरह संगठित करना चाहिए?
अगर आप इस राजनीतिक दल के संस्थापकों में एक होते तो इसके पक्ष में क्या दलील देते?
उत्तर-
यूनुस द्वारा नयी राजनीतिक पार्टी बनाना कोई गलत नहीं है यूनुस द्वारा बनायी गयी पार्टी के विरुद्ध बांग्लादेश के कई नेताओं ने जो बयान दिए हैं मिले-जुले हैं। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को दल बनाने का अधिकार होता है। यदि हम ऐसे दल के संस्थापकों में होते तो हम दल का गठन लोकतांत्रिक रूप से करते तथा लोक-कल्याण व विकास के लिए दल की नीतियाँ बनाते।

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